Thursday, August 2, 2012


Knowledge –


ज्ञान - सम्पूर्ण ज्ञान को दो भागों में बँटा जाता है । अध्यात्मिक ज्ञान शास्त्र और सांसारिक ज्ञान शास्त्र । अध्यात्मिक ज्ञान शास्त्र का सम्बन्ध अपरिवर्तनशील वस्तुओं के विज्ञान से सम्बंधित है . अध्यात्मिक ज्ञान शास्त्र और सांसारिक ज्ञान शास्त्र , इन दोनों को स्पष्ट करने के लिए इसाई धर्म में इन के लिए क्रमशः ‘पिता ’ और ‘पुत्र ’ सब्दों का प्रयोग किया गया है ।

यह केवल एक पौराणिक तथ्य नही है , बल्कि आप भी हर क्षण यह अनुभव कर सकते हैं की शुद्धता से केवल शुद्धता ही उत्प्पन होती है . केवल इसी लिए एक कुंवारी माँ से पैदा हुए ईसा मसीहा की पवित्रता के बारे में किसी तरह के विचार -विमर्श की आवश्यकता समझे बिना उन्हें ‘इश्वर का पुत्र कहा गया है ।

अपनी अंतरात्मा अथवा आत्मिक शुद्धता (कौमार्या ) को जानने के लिए यह संकल्प आवश्यक है । पूर्ण रूप से शुद्ध वाही है जो मानव स्पर्श से अछूता है . इसलिए सांसारिक व्यक्ति से उत्प्पन कोई भी सांसारिक विचार इस शुद्धता (कौमार्य ) को छू भी नही सकता है ।

कोई भी राजनैतिक , आर्थिक या वैज्ञानिक विचारधारा उसकी शुद्धता (कौमार्य ) को दूषित नही कर सकती । ब्रह्माण्ड की मूल धारणा मानव निर्मित है , यहाँ तक की ब्रह्माण्ड के निर्माणकर्ता का निर्माण भी मानव ने किया है ।

यदि ब्रह्माण्ड और इश्वर का अस्तित्वा है तो वह शुद्ध (कौमार्य ) मानवीय चेतना का ही अंश है । उसके एक बार पवित्र व शुद्ध (कौमार्य ) अवस्था में पहुँचने के बाद उससे उत्पन्न होने वाला सभी कुछ पवित्र व शुद्ध है । कुंवारी मेरी के गर्भ से ईसा मशीहा का जन्म इस तथ्या का साक्षी है ।

मेरे अपने विचार से इस कलियुग में कबीर और ईशा मशीहा ही भगवान् का अवतार हुए हैं । उन्होंने मानव शरीर से जन्म नही लिया केवल अवतारित ही हुए , एक ही तरह दोनों ही शिशु के रूप में नदी में मिले । संसार को छोड़ते हुए भी उनका शरीर नही मिला । ईशा मशीहा को गुफा में पत्थर से धक् दिया गया , जब अगले दिन खोला तो वहा कुछ न था . उसी तरह कबीर के शरीर को दो हिस्सों में बटने की हुयी , आधा मुसलमान को दफनाने के लिए और आधा हिन्दुओं को जलाने के लिए । तो केवल उनको शरीर के बजाय केवल फूल ही मिले ,। जो दोनों ने आपस में आधे आधे बाँट लिए ।

मस्तिष्क में केवल वर्गीकरण , विभाजन और चुनाव तथा विभेदन की क्षमता है । मस्तिष्क केवल उपलब्ध दो विकल्पों में से एक को चुन सकता है / आई क्यू को मस्तिष्क की योग्यता नापने का पैमाना समझा जाता है ।

पवित्र पाण्डुलिपि , इन दोनों के बीच मद्यास्ता करने वाली चेतना का मानवीकरण है । सांसारिक ज्ञान शास्त्र ठोस , द्रव / पानी , गैस / हवा , आकाश / अन्तरिक्ष और अग्नी / उष्मा इन्ही पाँच तत्वों के योग se बना है । ये पाँचों तत्वा एक दूसरे पर ही आश्रित हैं और एक दूसरे से ही बने हुए हैं । ठोस होने के लिए किसी वास्तु का पहले द्रव अवस्था में होना आवश्यक है , ठीक इसी तरह द्रव्य अवस्था में होने के लिए उष्मा अति आवश्यक है ।

आदिकाल से पृथ्वी सूर्य के चारों ओर इस तरह से परिकर्मा कर रही है की शुन्य से 100 डिग्री तापमान के मध्या जल द्रव अवस्था में ही बना रहता है । ब्रह्माण्ड में तापमान नकारात्मक से अनन्तं घनात्मक होता है । उष्मा उत्पन्न करने के लिए किसी ज्वलन गैस का होना अनियार्या है । ये सभी क्रियाये अन्तरिक्ष में घटती है , इसलिए अन्तरिक्ष मूल तत्वा है । अन्तरिक्ष में डराया द्वारा घेरी गयी जगह अन्तरिक्ष के विशाल आकार की तुलना में नागन्या है । सांसारिक ज्ञान शास्त्र की सभी लीलाएं अन्तरिक्ष में ही घटती है ।

विज्ञान स्वयं को ब्रह्माण्ड में द्रव्य द्वारा घेरे गए नगण्य स्थान तक ही सिमित किए हुए है । इसलिए यह कहा गया है की विज्ञान एक अपूर्ण दर्शन है , जब की दर्शन एक पूर्ण विज्ञान है । अध्यात्मिक ज्ञान शास्त्र मानते है की हम शुद्ध आत्मा है और मानव कैसे बनें यह सीखने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं । जन्म के समय हम पूर्ण रूप से होते हैं - शुद्ध चेतन । शुद्ध रूप से चेतन होने में कोई कठिनाई नही है , बल्कि कठिनाई मानव होने में है । हम अपनी अंतरात्मा से पूरी तरह विमुख हो गए है । हमारे प्रयासों का उद्देश्य केवल मानव निर्मित क्रियाओं में पारंगत होना है । व्यशार से सम्मान्य नियम हों या विधानिक नियम , बात घर चलाने की व्यवस्था की हो या मानवीय प्रेम की , हम केवल मानव निर्मित क्रियाओं और भावनाओं के इर्द गिर्द ही चक्कर काटते रहते हैं । हमारी यही पर्वृति हमे संसार के मायावी चक्र में फंसाए रखती है ।

आध्यात्मिक शास्त्र अपरिवर्तनशील है , अवुभाज्य और शुद्ध चेतना का विज्ञान है । शुद्ध चेतना का विज्ञान हमें यह अनुभव कराता है की सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सिवाय चेतना के कुछ भी नही है । सब कुछ मैं ही हूँ . मैं ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हूँ , ब्रह्माण्ड की सभी क्रियायें मेरे दायित्वा में हैं । मस्तिष्क में इतनी क्षमता नही है की वह अध्यात्मिक ज्ञान शास्त्र के सम्पूर्ण सत्व को ग्राहम कर सके ।

आपकी आई क्यू जितनी अधिक है आप उतने ही अधिक बुद्धिमान हो जाते हैं । जब की शुद्ध चेतना अपने आप में सम्पूर्ण और अविभाज्य है जिसे मस्तिष्क हज़ार जन्मों में भी पूरी तरह ग्रहण नही कर सकता ।

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